Monday, 12 June 2017
क्यों होते है क्रिकेटर 90 के स्कोर पर आउट
भारत का भूकंपी क्षेत्र
भारत को पांच विभिन्न भूकंपी क्षेत्रों में बांटा गया है। इन क्षेत्रों को भूकंप की व्यापकता के घटते स्तर के अनुसार क्षेत्र I से लेकर क्षेत्र V तक वर्गीकृत किया गया है।
क्षेत्र I जहां कोई खतरा नहीं है।
क्षेत्र II जहां कम खतरा है।
क्षेत्र III जहां औसत खतरा है।
क्षेत्र IV जहां अधिक खतरा है।
क्षेत्र V जहां बहुत अधिक खतरा है।
भारतीय उपमहाद्वीप में भूकंप का खतरा हर जगह अलग-अलग है। भारत को भूकंप के क्षेत्र के आधार पर चार हिस्सों जोन-2, जोन-3, जोन-4 तथा जोन-5 में बांटा गया है। जोन 2 सबसे कम खतरे वाला जोन है तथा जोन-5 को सर्वाधिक खतनाक जोन माना जाता है।
उत्तर-पूर्व के सभी राज्य, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड तथा हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्से जोन-5 में ही आते हैं। उत्तराखंड के कम ऊंचाई वाले हिस्सों से लेकर उत्तर प्रदेश के ज्यादातर हिस्से तथा दिल्ली जोन-4 में आते हैं। मध्य भारत अपेक्षाकृत कम खतरे वाले हिस्से जोन-3 में आता है, जबकि दक्षिण के ज्यादातर हिस्से सीमित खतरे वाले जोन-2 में आते हैं।
हालांकि राजधानी दिल्ली में ऐसे कई इलाके हैं जो जोन-5 की तरह खतरे वाले हो सकते हैं। इस प्रकार दक्षिण राज्यों में कई स्थान ऐसे हो सकते हैं जो जोन-4 या जोन-5 जैसे खतरे वाले हो सकते हैं। दूसरे जोन-5 में भी कुछ इलाके हो सकते हैं जहां भूकंप का खतरा बहुत कम हो और वे जोन-2 की तरह कम खतरे वाले हों। भारत में लातूर (महाराष्ट्र), कच्छ (गुजरात) जम्मू-कश्मीर में बेहद भयानक भूकंप आ चुके है। इसी तरह इंडोनिशिया और फिलीपींस के समुद्र में आए भयानक भूकंप से उठी सुनामी भारत, श्रीलंका और अफ्रीका तक लाखों लोगों की जान ले चुकी है।
सुरक्षित पासवर्ड होता क्या है
इसके लिए ज़रूरी है कि आपको हैकर्स के तौर तरीकों का बेहतर पता हो, ताकि आप सुरक्षा के बेहतर इंतज़ाम तलाश पाएं।
हैकर्स अमूमन किसी का भी पासवर्ड चुराने के लिए तीन तरीके इस्तेमाल करते हैं। वे फर्ज़ी ईमेल भेजते हैं, जिसके जरिए अचानक से अमीर होने, लाटरी खुलने जैसे लालच दिए जाते हैं। जब आप उन साइट्स पर जाते हैं तो आपको सीक्रेट कोड डालने को कहा जाता है। हैकर्स चालाकी, समझ और अनुमानों से काम लेते हैं। साईबर सुरक्षा के इस दौर में भी, दुनिया भर के लोगों में सबसे ज़्यादा PASSWORD को ही अपना पासवर्ड रख बैठते हैं। इसके बाद सबसे लोकप्रिय पासवर्ड है 123456, लेकिन हैकर्स ये सब जानते हैं।
कई लोग लोकप्रिय चलन के आधार पर अपना पासवर्ड बनाते हैं। लेकिन हैकिंग करने वालों के डाटाबेस में ऐसे कई संभावित पासवर्ड के संयोजन, आपके, आपके रिश्तेदारों के नाम और तिथियों से बनने वाले संयोजन मौजूद होते हैं।
रेडियो कार्बन डेटिंग विधि
रेडीयो कार्बन डेटींग(Radiocarbon dating) किसी वस्तु की आयु ज्ञात करने कि विधि है, इस विधि मे रेडीयोसक्रिय कार्बन समस्थानिक के गुणधर्मो का प्रयोग किया जाता है। इस विधि की खोज 1940 मे विलियर्ड लीबी(Willard Libby) ने की थी।
इस विधि मे 14C कार्बन समस्थानिक का प्रयोग होता है जो वातावरण मे नाइट्रोजन के कास्मिक किरणो से प्रतिक्रिया स्वरूप उत्पन्न होते रहता है। यह रेडीयोसक्रिय कार्बन आक्सीजन से प्रतिक्रिया कर रेडीयो सक्रिय कार्बन डाय आक्साईड CO2 बनाता है। यह रेडीयो सक्रिय CO2, प्रकाशसंश्लेषण प्रतिक्रिया मे पौधो द्वारा अवशोषित होकर खाद्य श्रृंखला(पौधो से प्राणीयों) मे शामिल हो जाती है।
सरल शब्दो मे C14 को पेड़/पौधे वातावरण से CO2 के रूप अवशोषित करते है। प्राणीयों मे यह C14 पेड़/पौधो को फल, सब्जी, अनाज के रूप मे खाने से आता है। मांसाहारी प्राणीयों मे यह C14 शाकाहारी प्राणीयों को खाने से आता है।
जब पेड़/प्राणी की मृत्यु होती है तब वे CO2 का अवशोषण बंद कर देते है। मृत्यु के समय के पश्चात से 14C की मात्रा घटना शुरु हो जाति है क्योंकि अब 14Cरेडीयो सक्रियता के फलस्वरूप क्षय होकर वापस नाइट्रोजन 14N मे परिवर्तित हो जाता है।
अब वनस्पति/प्राणी के अवशेषो(लकड़ी/हड्डी) मे शेष 14C की मात्रा से उस प्राणी की मृत्यु के समय की गणना की जा सकती है। यह विधि 50,000 वर्ष पुराने अवशेषो तक के लिये कारगर सिद्ध हुयी है।
पॉलीग्राफिक टेस्ट
दूसरा तरीक़ा होता है ट्रुथ सीरम या नार्को टेस्ट का इस्तेमाल। इसमें उस आदमी को एक दवा (जैसे सोडियम पेंटाथॉल) दी जाती है। इससे अभियुक्त बेहोशी की हालत में बात करता है और सच बातें उगल देता है।
क्या आपने कभी घड़ियाल Aligator को सोते देखा है
प्रयोग के दौरान ये पाया गया कि घड़ियाल सोते वक्त अपनी एक आंख खुली रखते हैं।
Earthquake (भूकंप)
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान के दो विशेषज्ञों का भूकंप आने की भविष्यवाणी पर आकलन:
हालांकि कुछ सेकेंड का समय बेहद कम होता है। यही वजह है कि इसको लेकर पहले कोई भविष्यवाणी नहीं की जाती है। भारत परिपेक्ष्य में तो ये संभव भी नहीं है। लेकिन जापान में कुछ सेकेंड पहले भूकंप का पता लग जाता है। लेकिन वहां भी सार्वजनिक तौर पर इसकी मुनादी नहीं की जाती है। लेकिन इसकी मदद से बुलेट ट्रेन और परमाणु संयंत्रों को ऑटोमेटिक ढंग से रोक दिया जाता है।"
मैरी क्यूरी
मैरी स्क्लाडोवका क्यूरी (लघु नाम: मैरी क्यूरी)विख्यात भौतिकविद और रसायनशास्त्री थी। मेरी ने रेडियम की खोज की थी।विज्ञान की दो शाखाओं (भौतिकी एवं रसायन विज्ञान) में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित होने वाली वह पहली वैज्ञानिक हैं।
वैज्ञानिक मां की दोनों बेटियों ने भी नोबल पुरस्कार प्राप्त किया। बडी बेटी आइरीन को 1935में रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ तो छोटी बेटी ईव को 1965 में शांति के लिए नोबेल पुरस्कार मिला।
मेरी का जन्म पोलैंड के वारसा नगर में हुआ था। महिला होने के कारण तत्कालीन वारसॉ में उन्हें सीमित शिक्षा की ही अनुमति थी। इसलिए उन्हें छुप-छुपाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करनी पड़ी। बाद में बड़ी बहन की आर्थिक सहायता की बदौलत वह भौतिकी और गणित की पढ़ाई के लिए पेरिस आईं। उन्होंने फ़्रांस में डॉक्टरेट पूरा करने वाली पहली महिला होने का गौरव पाया। उन्हें पेरिसविश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर बनने वाली पहली महिला होने का गौरव भी मिला। यहीं उनकी मुलाक़ात पियरे क्यूरी से हुई जो उनके पति बने। इस वैज्ञानिक दंपत्ति ने 1898 में पोलोनियम की महत्त्वपूर्ण खोज की। कुछ ही महीने बाद उन्होंने रेडियम की खोज भी की। चिकित्सा विज्ञान और रोगों के उपचार में यह एक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी खोज साबित हुई। 1903 में मेरी क्यूरी ने पी-एच.डी. पूरी कर ली। इसी वर्ष इस दंपत्ति को रेडियोएक्टिविटी की खोज के लिए भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला। 1911 में उन्हें रसायन विज्ञान के क्षेत्र में रेडियम के शुद्धीकरण (आइसोलेशन ऑफ प्योर रेडियम) के लिए रसायनशास्त्र का नोबेल पुरस्कार भी मिला। विज्ञान की दो शाखाओं में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित होने वाली वह पहली वैज्ञानिक हैं। वैज्ञानिक मां की दोनों बेटियों ने भी नोबल पुरस्कार प्राप्त किया। बडी बेटी आइरीन को 1935 में रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ तो छोटी बेटी ईव को 1965 में शांति के लिए नोबेल पुरस्कार मिला।
पुरस्कार :
भौतिकी नोबेल पुरस्कार (1903)
डेवी मेडल (1903)
मैटेक्की मेडल (1904)
एलीयट क्रेसन मेडल (1909)
अलबर्ट मेडल (1910)
रसायन नोबेल पुरस्कार (1911)
विलियर्ड गिब्स पुरस्कार (1921)
धरती पर जीवन
किंगडम एनीमेलिया: बहुकोशीय गतिशील जीव, जो अपना भोजन स्वयं तैयार नहीं कर सकते परन्तु दूसरों पर निर्भर रहते हैं।
सही एसडी कार्ड चुनें
स्मार्टफ़ोन, टैबलेट, म्यूज़िक प्लेयर, डिजिटल कैमरा, लैपटॉप - सभी के लिए आपको एसडी कार्ड का खांचा मिलता है।
लेकिन ध्यान रहे कि सभी उपकरण के लिए एसडी कार्ड अलग-अलग तरह के होते हैं, उनकी गति और संग्रहण क्षमता भी अलग होती है।
इसलिए अपनी ज़रूरत को पहले समझ लीजिये उसके बाद मेमोरी कार्ड खरीदने का सोचें।
क्लास 4 से शौकिया फोटोग्राफर का काम चल जाएगा। प्रोफ़ेशनल फ़ोटोग्राफ़र को अत्यंत उच्च गति संग्रहण क्षमता की ज़रूरत होती है और उनके कैमरा क्लास 10 के संग्रहण क्षमता को सपोर्ट करते हैं। इसीलिए अपनी ज़रूरत के हिसाब से अपने एसडी कार्ड को चुनिए।
अत्यंत उच्च गति संग्रहण क्षमता वाले कार्ड प्रोफ़ेशनल इस्तेमाल के लिए होते हैं और इसके लिए जेब ढीली करनी होगी।
ये कार्ड सभी उपकरण पर काम भी नहीं करेंगे। सभी एसडी कार्ड पर उसकी गति के बारे में जानकारी होती है। इसलिए आपको चुनने में कोई दिक़्कत नहीं होगी।
स्टैंडर्ड एसडी कार्ड की संग्रहण क्षमता 1-4 गीगाबाइट की होती है। रोज़मर्रा के इस्तेमाल वाले SDHC कहलाने वाले कार्ड में आपको 2-32 गीगाबाइट संग्रहण क्षमता मिल जायेगी।
Courtesy.....BBC
LED.Light Emitting Diode
अर्ध चालक-डायोड होता है, जिसमें विद्युत धारा प्रवाहित करने पर यह प्रकाश उत्सर्जित करता है।
यह प्रकाश इसकी बनावट के अनुसार किसी भी रंग का हो सकता है। एल.ई.डी. कई प्रकार की होती हैं। इनमें मिनिएचर, फ्लैशिंग, हाई पावर, अल्फा-न्यूमेरिक, बहुवर्णी और ओ.एल.ई.डी प्रमुख हैं।
मिनिएचर एल.ई.डी. का प्रयोग इंडिकेटर्स में किया जाता है। लैपटॉप, नोटबुक, मोबाइल फोन, डीवीडी प्लेयर, वीडियो गेम और पी.डी.ए. आदि में प्रयोग होने वाली ऑर्गैनिक एल.ई.डी. (ओ.एल.ई.डी.) को एल.सी.डी. और सी.आर.टी. टेक्नोलॉजी से कहीं बेहतर माना जाता है।
यह एक इलेक्ट्रॉनिक चिप है जिसमें से बिजली गुज़रते ही उसके
इलेक्ट्रॉन पहले तो आवेशित हो जाते हैं और उसके बाद ही, अपने आवेश वाली ऊर्जा को प्रकाश के रूप में उत्सर्जित कर देते हैं।
इसका मुख्य प्रकाशोत्पादन घटक गैलियम आर्सेनाइड होता है। यही विद्युत ऊर्जा को प्रकाश में बदलता है।
इनकी क्षमता 50% से भी अधिक होती है। इस तरह वे विद्युत ऊर्जा को प्रकाश ऊर्जा में बदलते हैं। इसकी विशेषता ये है, कि इसे किसी प्लास्टिक फिल्म में भी लगाया जा सकता है। एल.ई.डी. पारंपरिक प्रकाश स्रोतों की तुलना मे बहुत उन्नत है जिसका कारण है, ऊर्जा की कम खपत, लंबा जीवनकाल, उन्नत दृढ़ता, छोटा आकार और तेज स्विचन आदि,
हालांकि, यह अपेक्षाकृत महंगी होती हैं और परंपरागत स्रोतों की तुलना में इनके लिए अधिक सटीक
विद्युत धारा और गर्मी के प्रबंधन की जरूरत होती है। एक विद्युत बल्ब लगभग 1000 घंटे ही प्रकाश दे पाता है, जबकि एल.ई.डी. एक लाख घंटे भी प्रकाश दे सकते हैं।
इनके लाभ बहुत हैं:-
छोटे पैनेलों में उपकरण या यंत्र की दशा (स्टेट) बताने के लिय
े
विज्ञापन आदि के लिये डिस्प्ले-बोर्ड बनाने में।
सजावटी प्रकाश के लिए
सड़क पर लाल बत्ती संकेतकों के रूप में भी।
Friends Forever
फ्लोरीन Fluorine
फ़्लोरीन आवर्त सारणी के सप्तसमूह का प्रथम तत्वहै, जिसमें सर्वाधिक अधातु गुण वर्तमान हैं। इसका एक स्थिर समस्थानिक प्राप्त है और तीन रेडियोऐक्...
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जॉन डाल्टन एक अंग्रेज़ वैज्ञानिक थे। इन्होंने पदार्थ की रचना सम्बन्धी सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जो 'डाल्टन के परमाणु सिद्धान्त' ...
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जेम्स प्रेस्कॉट जूल (अंग्रेजी: James Prescott Joule)सैल्फोर्ड, लंकाशायर में जन्मे एक अंग्रेज भौतिकविज्ञानी थे। पुरस्कार : रायल मेड्ल (18...











