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Monday, 12 June 2017

क्यों होते है क्रिकेटर 90 के स्कोर पर आउट

कितनी ही बार क्रिकेट के मुकाबले में आपने बल्लेबाज को शतक के करीब पहुंचते ही विकेट गंवाते देखा होगा। विज्ञान कहता है कि जब शतक सामने हो तो कई खिलाड़ियों को "नर्वस नाइंटीज" का रोग लग जाता है।
आपका पसंदीदा क्रिकेटर क्रीज पर है और शानदार खेल दिखाते हुए अब शतक की ओर बढ़ रहा है। 90 का स्कोर पार करने पर आप शतक का जश्न मनाने के लिए तैयार होने लगते हैं कि तभी खिलाड़ी आउट। खिलाड़ी, उसकी टीम और खेल में दिलचस्पी रखने वाले सभी लोगों को निराशा तो होती ही है लेकिन वैज्ञानिक जानना जाहते हैं कि आखिर ऐसा होना इतना आम क्यों है। वैज्ञानिको की मानें तो इसके पीछे वैज्ञानिक कारण हैं।


ऑस्ट्रेलिया के ब्रिस्बेन में स्थित क्वीन्सलैंड यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिको ने पाया है कि ऐसी परिस्थिति में क्रिकेटर "नर्वस नाइंटीज" के शिकार हो जाते हैं। जब भी आशंकाओं और सावधानी का मिलाजुला भाव इन्हें घेरता है, तो नर्वस नाइंटीज पारी में अपना असर दिखाने लगता है।
1971 से 2014 के बीच हुए एकदिवसीय क्रिकेट मैचों का विस्तृत विश्लेषण किया गया। वैज्ञानिको ने पाया कि जब भी बल्लेबाज किसी बड़े स्कोर के करीब पहुंचता है, तो वह उस निकटतम जादुई नंबर तक पहुंचने तक अपनी स्ट्राइक रेट कम कर देता है। चाहे वह अर्ध शतक हो या शतक, एक बार उस जादुई नंबर तक पहुंच जाने के बाद बल्लेबाज की स्ट्राइक रेट करीब 45 प्रतिशत बढ़ जाती है। इसके अलावा विश्लेषण में यह भी पता चला कि वह बड़ा स्कोर बनाने के बाद खिलाड़ियों के आउट होने की दर भी लगभग दोगुनी हो जाती हैं।
सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड में छपी इस शोध के बारे में बताते हुए क्वीन्सलैंड यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी की एक शाखा स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर लियोनेल पेज बताते हैं, "जाहिर है कि सभी खिलाड़ियों का एक ही साझा लक्ष्य होता है, वे है मैच जीतना। लेकिन बल्लेबाज के नाम कई निजी उपलब्धियां भी होती हैं जिनका टीम पर काफी सामित प्रभाव पड़ता है।" पेज बताते हैं कि टीम के लिए बल्लेबाज के 99 से 100 तक जाने के बीच केवल एक रन का फासला होता है, जबकि खिलाड़ी के लिए वह बहुत बड़ी बात होती है। इसके पीछे का मनोवैज्ञानिक पहलू बेहद दिलचस्प है। 100 के पास पहुंचने की उम्मीद से बल्लेबाज तनाव में आ जाते हैं। पेज कहते हैं, "शायद ये नर्वस नाइंटीज ही हैं, जिनके कारण बल्लेबाज 100 के करीब पहुंचने पर तनावग्रस्त हो जाता है और जोखिम उठाना कम कर देता है।"

भारत का भूकंपी क्षेत्र

भारत का भूकंपी क्षेत्र
भारत को पांच विभिन्न भूकंपी क्षेत्रों में बांटा गया है। इन क्षेत्रों को भूकंप की व्यापकता के घटते स्तर के अनुसार क्षेत्र I से लेकर क्षेत्र V तक वर्गीकृत किया गया है।
क्षेत्र I जहां कोई खतरा नहीं है।
क्षेत्र II जहां कम खतरा है।
क्षेत्र III जहां औसत खतरा है।
क्षेत्र IV जहां अधिक खतरा है।
क्षेत्र V जहां बहुत अधिक खतरा है।


भारतीय उपमहाद्वीप में भूकंप का खतरा हर जगह अलग-अलग है। भारत को भूकंप के क्षेत्र के आधार पर चार हिस्सों जोन-2, जोन-3, जोन-4 तथा जोन-5 में बांटा गया है। जोन 2 सबसे कम खतरे वाला जोन है तथा जोन-5 को सर्वाधिक खतनाक जोन माना जाता है।
उत्तर-पूर्व के सभी राज्य, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड तथा हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्से जोन-5 में ही आते हैं। उत्तराखंड के कम ऊंचाई वाले हिस्सों से लेकर उत्तर प्रदेश के ज्यादातर हिस्से तथा दिल्ली जोन-4 में आते हैं। मध्य भारत अपेक्षाकृत कम खतरे वाले हिस्से जोन-3 में आता है, जबकि दक्षिण के ज्यादातर हिस्से सीमित खतरे वाले जोन-2 में आते हैं।
हालांकि राजधानी दिल्ली में ऐसे कई इलाके हैं जो जोन-5 की तरह खतरे वाले हो सकते हैं। इस प्रकार दक्षिण राज्यों में कई स्थान ऐसे हो सकते हैं जो जोन-4 या जोन-5 जैसे खतरे वाले हो सकते हैं। दूसरे जोन-5 में भी कुछ इलाके हो सकते हैं जहां भूकंप का खतरा बहुत कम हो और वे जोन-2 की तरह कम खतरे वाले हों। भारत में लातूर (महाराष्ट्र), कच्छ (गुजरात) जम्मू-कश्मीर में बेहद भयानक भूकंप आ चुके है। इसी तरह इंडोनिशिया और फिलीपींस के समुद्र में आए भयानक भूकंप से उठी सुनामी भारत, श्रीलंका और अफ्रीका तक लाखों लोगों की जान ले चुकी है।

सुरक्षित पासवर्ड होता क्या है

सुरक्षित पासवर्ड होता क्या है?
आधुनिक जीवनशैली में पासवर्ड के बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं है। मोबाइल फ़ोन से लेकर कंप्यूटर खोलने, बैंक खाता खोलने, घर के लॉक को खोलने, हर जगह पासवर्ड का इस्तेमाल होता है। हमारी निर्भरता पासवर्ड पर जितनी बढ़ती जा रही है, उतने ही हैकरों के हमले भी बढ़ रहे हैं, जो हमारी गोपनीय सूचनाओं को उड़ा ले जाते हैं। ये जानना ज़रूरी है कि पूरी दुनिया में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों में 98।8 प्रतिशत वही 10,000 पासवर्ड्स का इस्तेमाल करते हैं।
हैकर छह एल्फ़ा-न्यूमैरिक(अक्षरो और अंको से मिश्रीत) के पासवर्ड को एक सैकेंड के 1000वें हिस्से में, 12 एल्फ़ा-न्यूमैरिक डिजिट के पासवर्ड को 3.21 मिनट में कंप्यूटर एलगोरिदम का इस्तेमाल करते हुए तोड़ सकते हैं।
तो फिर सुरक्षित पासवर्ड क्या है?
इसके लिए ज़रूरी है कि आपको हैकर्स के तौर तरीकों का बेहतर पता हो, ताकि आप सुरक्षा के बेहतर इंतज़ाम तलाश पाएं।
हैकर्स कैसे चुराते हैं पासवर्ड?

हैकर्स अमूमन किसी का भी पासवर्ड चुराने के लिए तीन तरीके इस्तेमाल करते हैं। वे फर्ज़ी ईमेल भेजते हैं, जिसके जरिए अचानक से अमीर होने, लाटरी खुलने जैसे लालच दिए जाते हैं। जब आप उन साइट्स पर जाते हैं तो आपको सीक्रेट कोड डालने को कहा जाता है। हैकर्स चालाकी, समझ और अनुमानों से काम लेते हैं। साईबर सुरक्षा के इस दौर में भी, दुनिया भर के लोगों में सबसे ज़्यादा PASSWORD को ही अपना पासवर्ड रख बैठते हैं। इसके बाद सबसे लोकप्रिय पासवर्ड है 123456, लेकिन हैकर्स ये सब जानते हैं।
अगर आप ये सोचते हैं कि आप अपने पालतू जानवर या घर के किसी सदस्य के नाम पर पासवर्ड रखें तो ये भी सुरक्षित नहीं होता है। क्योंकि हैकर्स आपकी फेसबुक और ट्विटर प्रोफ़ाइल के जरिए आपसे जुड़े लोगों के नाम, महत्वपूर्ण तिथियों को आसानी से जान जाते हैं।
कई लोग लोकप्रिय चलन के आधार पर अपना पासवर्ड बनाते हैं। लेकिन हैकिंग करने वालों के डाटाबेस में ऐसे कई संभावित पासवर्ड के संयोजन, आपके, आपके रिश्तेदारों के नाम और तिथियों से बनने वाले संयोजन मौजूद होते हैं।
अगर दूसरे तरीके से भी हैकिंग करने वाले कामयाब नहीं होते हैं तो वे तीसरा रास्ता अपनाते हैं। वे कंप्यूटर एलोगरिदम का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हैकरों के चुंगल से बचा नहीं जा सकता है। इसके काफ़ी आसान से उपाय हैं।
ये 5 बातें अच्छी तरह समझ लें
1. सबसे पहली बात तो ये है कि आप अपने ऑनलाइन खातों को तीन श्रेणियों में डालें- सबसे महत्वपूर्ण, जिसकी सुरक्षा सबसे ज़्यादा जरूरी है। दूसरा, जिसकी सुरक्षा थोड़ी कमतर हो सकती है और तीसरे वो ऑनलाइन ख़ाते जो बहुत महत्वपूर्ण नहीं हैं। यानी बैंक ख़ाते और ईमेल एकाउंट की सुरक्षा का स्तर अलग अलग होना चाहिए।
2. अपना पासवर्ड जितना लंबा और इधर-उधर से उठाए शब्दों, अंकों से बनाया हो, वो बेहतर है। मतलब जितने ज़्यादा शब्द हों, उतना बेहतर। क्योंकि कंप्यूटर एलोगरिदम के जरिए लंबे शब्दों के पासवर्ड को तोड़ना मुश्किल होता है। अगर आपका पासवर्ड दो शब्द का है तो ये एक शब्द के पासवर्ड के मुक़ाबले दस गुना मुश्किल है। तीन शब्द हों तो उसे तोड़ना सौ गुना ज्यादा मुश्किल है।
3. शब्दों के इस्तेमाल के अलावा अलग अलग विशेष अक्षरो(~,!,@,#,$,%,^,&,*) का इस्तेमाल भी पासवर्ड को सुरक्षित बनाता है। ख़ासकर ऐसे अक्षर जिनका आपस में कोई संबंध नहीं बनता हो। अगर आपने दस शब्दों का पासवर्ड बनाया और उसमें विशेष अक्षरो का इस्तेमाल हुआ तो उसे तोड़ने के लिए हैकरों को तीन सप्ताह से ज्यादा का समय लग सकता है।
4. हालांकि टेक विशेषज्ञों के मुताबिक अगर आपने अपना पासवर्ड 15 लेटर्स से ज़्यादा का बनाया और उसमें कैपिटल लेटर, स्माल लेटर, स्पेशल कैरेक्टर डाल दिए तो ये सबसे महफ़ूज़ है। इसके बाद ये फ़र्क नहीं पड़ता कि पासवर्ड 15 लेटर्स का है या 25 लेटर्स का, एक ही शब्द बार-बार आता है या नहीं। ऐसा पासवर्ड लंबे समय तक सुरक्षित रह सकता है। इसे बार बार बदलने की जरूरत भी नहीं होगी।
5. अब ऐसे प्रोग्राम आ रहे हैं जो आने वाले समय में आपका की-स्ट्राइक पैटर्न यानी आपके टाइपिंग स्टाइल और रिदम से आपका पासवर्ड तय करेगा, जो आप टाइप कर रहे हैं उससे नहीं। फिर तो पासवर्ड की समस्या काफ़ी हद तक हल हो ही जाएगी।
स्रोत : बी बी सी हिंदी

रेडियो कार्बन डेटिंग विधि

रेडीयो कार्बन डेटींग(Radiocarbon dating) किसी वस्तु की आयु ज्ञात करने कि विधि है, इस विधि मे रेडीयोसक्रिय कार्बन समस्थानिक के गुणधर्मो का प्रयोग किया जाता है। इस विधि की खोज 1940 मे विलियर्ड लीबी(Willard Libby) ने की थी।

इस विधि मे 14C कार्बन समस्थानिक का प्रयोग होता है जो वातावरण मे नाइट्रोजन के कास्मिक किरणो से प्रतिक्रिया स्वरूप उत्पन्न होते रहता है। यह रेडीयोसक्रिय कार्बन आक्सीजन से प्रतिक्रिया कर रेडीयो सक्रिय कार्बन डाय आक्साईड CO2 बनाता है। यह रेडीयो सक्रिय CO2, प्रकाशसंश्लेषण प्रतिक्रिया मे पौधो द्वारा अवशोषित होकर खाद्य श्रृंखला(पौधो से प्राणीयों) मे शामिल हो जाती है।
सरल शब्दो मे C14 को पेड़/पौधे वातावरण से CO2 के रूप अवशोषित करते है। प्राणीयों मे यह C14 पेड़/पौधो को फल, सब्जी, अनाज के रूप मे खाने से आता है। मांसाहारी प्राणीयों मे यह C14 शाकाहारी प्राणीयों को खाने से आता है।

जब पेड़/प्राणी की मृत्यु होती है तब वे CO2 का अवशोषण बंद कर देते है। मृत्यु के समय के पश्चात से 14C की मात्रा घटना शुरु हो जाति है क्योंकि अब 14Cरेडीयो सक्रियता के फलस्वरूप क्षय होकर वापस नाइट्रोजन 14N मे परिवर्तित हो जाता है।

अब वनस्पति/प्राणी के अवशेषो(लकड़ी/हड्डी) मे शेष 14C की मात्रा से उस प्राणी की मृत्यु के समय की गणना की जा सकती है। यह विधि 50,000 वर्ष पुराने अवशेषो तक के लिये कारगर सिद्ध हुयी है।

पॉलीग्राफिक टेस्ट

पॉलीग्राफ़िक टेस्ट झूठ पकड़ने वाली तकनीक है जिसमें आदमी की बातचीत के कई ग्राफ़ एक साथ बनते हैं और इससे हर संभावित झूठ को पकड़ने की कोशिश की जाती है।
दूसरा तरीक़ा होता है ट्रुथ सीरम या नार्को टेस्ट का इस्तेमाल। इसमें उस आदमी को एक दवा (जैसे सोडियम पेंटाथॉल) दी जाती है। इससे अभियुक्त बेहोशी की हालत में बात करता है और सच बातें उगल देता है।
पॉलीग्राफ़िक टेस्ट को विशेषज्ञ करते हैं और वही नतीजों का विश्लेषण करते हैं। लेकिन ये कैसे पता चलता है कि जिस इंसान की जांच हो रही है वो सच बोल रहा है या झूठ?

असल में जिस इंसान पर टेस्ट होना है उसकी धड़कन, सांस और रक्तचाप के उतार चढ़ाव को ग्राफ़ के रूप में दर्ज किया जाता है। शुरू में नाम, उम्र और पता पूछा जाता है और इसके बाद अचानक उस विशेष दिन की घटना के बारे में पूछ लिया जाता है। इस अचानक सवाल से उस इंसान पर मनोवैज्ञानिक दबाव पड़ता है और ग्राफ़ में बदलाव दिखता है। अगर बदलाव नहीं आता है तो इसका मतलब है कि वो सच बोल रहा है। इस तरह से उस व्यक्ति से 11 सवाल पूछे जाते हैं जिनमें चार या पांच उस घटना से संबंधित होते हैं।
जिन जिन सवालों पर ग्राफ़ में बदलाव आता है, उसका विशेषज्ञ विश्लेषण करते हैं।लेकिन अगर इसमें विशेषज्ञता नहीं है तो इससे ग़लत नतीजे भी निकल सकते हैं। इसीलिए अनुभवी विशेषज्ञों द्वारा ही इसे कराया जाना चाहिए। अगर किसी खास घटना के बारे में कोई सबूत है और पॉलीग्राफ़ी टेस्ट में झूठ बोला गया है तो वहीं उसका झूठ पकड़ा जाता है। और इसे कोर्ट में मान भी लिया जाता है।
अधिक मानसिक दृढ़ता वाले व्यक्तियों पर ये टेस्ट फेल भी हो सकता है इसलिए इसकी 100% वैद्यता की पुष्टि नहीं की जा सकती है। क्योंकि मनुष्य की मानसिक क्षमता अधभुत होती है और वह परिस्थितियों के हिसाब से इसमें अनपेक्षित बदलाव भी कर सकता है, वह इस प्रकार की परिस्थितियों से गुजरने के लिए पहले से भी तैयार हो सकता है या फिर मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण भी ले सकता है। ऐसे में विचारणीय बिंदु यह है कि आजकल आदतन अपराधी और आतंकवादी को इससे गुजरने का और बिना पकड़े जाये सफाई से झूठ बोलकर चीजो में उलझाने वाली नई दिशाओं को पैदा करने का प्रशिक्षण अवश्य दिया जाता होगा, जिससे पूछताछ एजेंसी को गुमराह किया जा सके। इसलिए इस सिद्धांत में मनोवैज्ञानिकता और विज्ञान का सामंजस्य बिठाते हुए नई तकनिकी विकसित करने की आश्यकता हैं।

क्या आपने कभी घड़ियाल Aligator को सोते देखा है

क्या आपने कभी किसी घड़ियाल को सोते हुए देखा है। अगर हां, तो आपने देखा होगा कि सोते वक्त उसकी एक आंख खुली रहती है जिससे वो आपको देख सकता है।
पर क्या आप जानते हैं कि ऐसा क्यों है। इसी बात की खोज कुछ ऑस्ट्रेलियाई जीव विज्ञानियों ने की है।
जरनल ऑफ एक्सपेरिमेंटल बायोलॉजी में छपे एक लेख के मुताबिक घड़ियाल सोते वक्त अपनी एक आंख खुली रखते हैं, जिससे वो सबकुछ देख सकते हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक ऐसा इसलिए होता है क्योंकि एक समय पर घड़ियाल के मस्तिष्क का एक ही हिस्सा बंद होता है।
ऑस्ट्रेलियाई जीव शास्त्रियों की ओर से किए गए प्रयोग में तीन घड़ियाल के बच्चों को उत्तरी क्वीन्सलैंड से लॉ ट्रोब यूनिवर्सिटी के एक बड़े जल जीवालय में रखा गया। इस दौरान इन पर कैमरों के ज़रिए 24 घंटे निगरानी रखी गई।

प्रयोग के दौरान ये पाया गया कि घड़ियाल सोते वक्त अपनी एक आंख खुली रखते हैं।
लेख के मुताबिक सोते वक्त घड़ियालों के मस्तिष्क का एक हिस्सा निगरानी रखने का काम करता है। जबकि दूसरे हिस्से को आराम मिलता है।
हालांकि वैज्ञानिकों का मानना है कि एक आंख खोलकर सोना जीवों में आम बात है। कई किस्म के पक्षी, डॉलफिन मछली और दरियाई घोड़े भी एक आंख खोलकर ही सोते हैं।
स्रोत : बी बी सी

Earthquake (भूकंप)

क्या भूकंप का पूर्वानुमान लगाना संभव है? क्या वैज्ञानिकों को ये मालूम हो सकता है कि कब और कहां भूकंप आ सकता है?

विज्ञान की तमाम आधुनिकताओं के बाद भी ये संभव नहीं है। लेकिन भूकंप आने के बाद उसके असर के दायरे में, ये बताना संभव है कि भकूंप के झटके कहाँ, कुछ सेकेंड बाद आ रहे हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि सोशल मीडिया में भूकंप आने के बारे में लगाए जा रहे कयास और टिप्पणियां बेबुनियाद और वैज्ञानिक तौर पर अतार्किक हैं।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान के दो विशेषज्ञों का भूकंप आने की भविष्यवाणी पर आकलन:
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान के प्रोफ़ेसर चंदन घोष बताते हैं, "भूकंप के केंद्र में तो नहीं, लेकिन उसके दायरे में आने वाले इलाकों में कुछ सेकेंड पहले वैज्ञानिक तौर पर ये बताया जा सकता है कि वहां भूकंप आने वाला है।"
हालांकि कुछ सेकेंड का समय बेहद कम होता है। यही वजह है कि इसको लेकर पहले कोई भविष्यवाणी नहीं की जाती है। भारत परिपेक्ष्य में तो ये संभव भी नहीं है। लेकिन जापान में कुछ सेकेंड पहले भूकंप का पता लग जाता है। लेकिन वहां भी सार्वजनिक तौर पर इसकी मुनादी नहीं की जाती है। लेकिन इसकी मदद से बुलेट ट्रेन और परमाणु संयंत्रों को ऑटोमेटिक ढंग से रोक दिया जाता है।"
तो कुछ सेकेंड पहले भी भूकंप का पता कैसे लग सकता है?
प्रोफ़ेसर चंदन घोष बताते हैं, "जब कोई भूकंप आता है तो दो तरह के वेव निकलते हैं, एक को प्राइमरी वेव कहते हैं और दूसरे को सेकेंडरी या सीयर्स वेव। प्राइमरी वेव औसतन 6 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से चलती है जबकि सेकेंडरी वेव औसतन 4 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से। इस अंतर के चलते प्रत्येक 100 किलोमीटर में 8 सेकेंड का अंतर हो जाता है। यानी भूकंप केंद्र से 100 किलोमीटर दूरी पर 8 सेकेंड पहले पता चल सकता है कि भूकंप आने वाला है।"
इस लिहाज़ से देखें तो मौजूदा वैज्ञानिक क्षमताओं को देखते हुए भूकंप के बारे में भविष्यवाणी करना नामुमकिन है।
लेकिन सेंकेड के अंतर से जान माल के नुकसान को कुछ कम किया जा सकता है। चंदन घोष के मुताबिक जापान और ताइवान जैसे देशों में इस तकनीक के इस्तेमाल से नुकसान काफी कम हो सकता है। हालाँकि सोशल मीडिया में भकूंप के आने को लेकर कयासबाजी की जा रही है जो निर्रथक है।
ये माना जाता रहा है कि भूकंप आने की जानकारी चूहे, सांप और कुत्ते को पहले हो जाती है।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान के एसोसिएट प्रोफ़ेसर आनंद कुमार कहते हैं, "चूहे और सांप तो पृथ्वी के अंदर ही रहते हैं तो उन्हें निश्चित तौर पर पहले पता चल सकता है। कुत्तों में भी भांपने की क्षमता होती है। ये मानना काफी हद तक सच हो सकता है, लेकिन इस दिशा में वैज्ञानिकों ने अब तक ज़्यादा शोध नहीं किया है।"

मैरी क्यूरी

मैरी स्क्लाडोवका क्यूरी (लघु नाम: मैरी क्यूरी)विख्यात भौतिकविद और रसायनशास्त्री थी। मेरी ने रेडियम की खोज की थी।विज्ञान की दो शाखाओं (भौतिकी एवं रसायन विज्ञान) में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित होने वाली वह पहली वैज्ञानिक हैं।

वैज्ञानिक मां की दोनों बेटियों ने भी नोबल पुरस्कार प्राप्त किया। बडी बेटी आइरीन को 1935में रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ तो छोटी बेटी ईव को 1965 में शांति के लिए नोबेल पुरस्कार मिला।

मेरी का जन्म पोलैंड के वारसा नगर में हुआ था। महिला होने के कारण तत्कालीन वारसॉ में उन्हें सीमित शिक्षा की ही अनुमति थी। इसलिए उन्हें छुप-छुपाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करनी पड़ी। बाद में बड़ी बहन की आर्थिक सहायता की बदौलत वह भौतिकी और गणित की पढ़ाई के लिए पेरिस आईं। उन्होंने फ़्रांस में डॉक्टरेट पूरा करने वाली पहली महिला होने का गौरव पाया। उन्हें पेरिसविश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर बनने वाली पहली महिला होने का गौरव भी मिला। यहीं उनकी मुलाक़ात पियरे क्यूरी से हुई जो उनके पति बने। इस वैज्ञानिक दंपत्ति ने 1898 में पोलोनियम की महत्त्वपूर्ण खोज की। कुछ ही महीने बाद उन्होंने रेडियम की खोज भी की। चिकित्सा विज्ञान और रोगों के उपचार में यह एक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी खोज साबित हुई। 1903 में मेरी क्यूरी ने पी-एच.डी. पूरी कर ली। इसी वर्ष इस दंपत्ति को रेडियोएक्टिविटी की खोज के लिए भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला। 1911 में उन्हें रसायन विज्ञान के क्षेत्र में रेडियम के शुद्धीकरण (आइसोलेशन ऑफ प्योर रेडियम) के लिए रसायनशास्त्र का नोबेल पुरस्कार भी मिला। विज्ञान की दो शाखाओं में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित होने वाली वह पहली वैज्ञानिक हैं। वैज्ञानिक मां की दोनों बेटियों ने भी नोबल पुरस्कार प्राप्त किया। बडी बेटी आइरीन को 1935 में रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ तो छोटी बेटी ईव को 1965 में शांति के लिए नोबेल पुरस्कार मिला।

पुरस्कार :

भौतिकी नोबेल पुरस्कार (1903)
डेवी मेडल (1903)
मैटेक्की मेडल (1904)
एलीयट क्रेसन मेडल (1909)
अलबर्ट मेडल (1910)
रसायन नोबेल पुरस्कार (1911)
विलियर्ड गिब्स पुरस्कार (1921)

धरती पर जीवन

धरती पर जीवन के असंख्य रूप हैं। जीवन यहां इतने विस्मयकारी विन्यास में प्रदर्शित होता है कि यदि इसे यथोचित रूप से वर्गीकृत न किया जाए तो इसे समझना तो दूर की बात है, इसका अध्ययन करना भी असंभव होगा। वनस्पतियों और प्राणियों को वर्गीकृत करने की क्रमबद्ध प्रणाली स्वीडन के जीवविज्ञानी कैरोलस लिनियस के विचारों पर आधारित थी पर कुछ सुधारों के साथ आज भी इसी को अपनाया जा रहा है। उन्होंने वनस्पतियों और प्राणियों के वर्गीकरण से संबंधित अपने विचार ‘सिस्टेमा नेचुरी’ में प्रकाशित किए। सन् 1735 में, सिस्टेमा नेचुरी के प्रथम संस्करण में उन्होंने हर चीज को प्राणि, वनस्पति एवं खनिज जगत में बांटा, कुछ समय बाद उन्होंने नामकरण की ‘द्विनामी पद्धति’ प्रस्तुत की जिसके अन्तर्गत प्रत्येक प्रजाति की पहचान दो शब्दों के नाम से की गई - पहला नाम वंश का और दूसरा प्रजाति का विशिष्ट नाम। उदाहरण के लिए टायरेनोसॉरस रैक्स, जहां टायरेनोसॉरस वंश का नाम है जबकि रैक्स विशिष्ट या जातिगत नाम। यह प्रणाली 1758 तक सम्पूर्ण विश्व में अपना ली गई और लगभग बगैर किसी फेरबदल के आज भी मान्य है।
वर्गीकरण के अनुक्रम तंत्र में सबसे ऊपर आने वाला संवर्ग ‘जगत’ कहलाता है। इस स्तर पर जीवों को कोशिकीय संरचना एवं पोषण की विधि के आधार पर श्रेणीबद्ध किया जाता है। जीव एक कोशिकीय है अथवा बहुकोशिकीय और यह खाद्य पदार्थ अवशोषित करता है, खाता है अथवा उत्पादित करता है। ये विवेचना योग्य तथ्य होते हैं। शुरूआत में यह माना गया था कि केवल दो ही जगत का अस्तित्व है; प्राणि जगत एवं वनस्पति जगत। परन्तु सूक्ष्मदर्शी एवं बेहतर वैज्ञानिक तकनीकों ने इस आधार को विस्तृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। आज जीवविज्ञान जीवधारियों को सामान्यतया पांच जगत (किंगडम) में परिभाषित करता है।
किंगडम एनीमेलिया: बहुकोशीय गतिशील जीव, जो अपना भोजन स्वयं तैयार नहीं कर सकते परन्तु दूसरों पर निर्भर रहते हैं।
किंगडम प्लान्टी: ऐसे जीव जो अपना भोजन खुद तैयार कर सकते हैं। उदाहरण समस्त हरे पौधे।
किंगडम प्रोटिस्टा: जीव जो एकमात्र संश्लिष्ट कोशिका से बने हों। उदाहरण, प्रोटोज़ोआ एवं एककोशीय शैवाल।
किंगडम फंगाई: ऐसे जीव जो अपना भोजन जीवित एवं निर्जीव तत्वों से अवशोषित करते हैं। उदाहरण, यीस्ट।
किंगडम मोनेरा: जीव जो एक सरल कोशिका से बने हों। उदाहरण, जीवाणु एवं नीले-हरे शैवाल।
एक किंगडम अथवा जगत को बहुत भिन्न, सुव्यक्त और निश्चित गुणों के आधार पर फायला यानी संघों में विभाजित किया जाता है। उदाहरण के लिए प्राणिजगत के अन्तर्गत कॉर्डेटा एक प्रमुख संघ है जिसमें आद्यपृष्ठवंश या नोटोकॉर्ड वाले प्राणियों को सम्मिलित किया गया है। नोटोकॉर्ड एक कठोर रॉड की तरह की संरचना होती है जिसे रीढ़ की हड्डी का एक आदिमयुगीन प्रतिरूप माना जा सकता है। अन्य संघों में एनीलिडा या खण्ड कृमि, आथ्र्रोपोडा या जुड़े हुए पैरों वाले जीव एवं इकाइनोडरमेटा, समुद्री जीव जिनमें पांच परती सममिति हो, शामिल हैं। संघ के अन्तर्गत विभिन्न वर्ग या क्लास सम्मिलित होते हैं। एक वर्ग में वे जीव आते हैं जो कुछ मूल लक्षणों में एक समान होते हैं। उदाहरण के लिए, सभी स्तनधारी दुग्धस्राव करते हैं और उनका शरीर बालों या फर से ढका होता है। वर्ग मैमेलिया के अन्तर्गत अनेकों विविधताओं वाले प्राणि आते हैं, जैसे आदमी, जिराफ और व्हेल। संघ आथ्र्रोपोडा के अन्तर्गत इन्सैक्टा (कीट) एक वर्ग है।


एक ही वर्ग के जीवों की तुलना में एक ही गण अथवा ऑर्डर के जीव आपस में अधिक समानताएं रखते हैं। एक ही गण के जीवों को देखने से कई विकासवादी संबंधों को प्राप्त किया जा सकता हैं वर्ग मैमेलिया में लगभग 26 गुण आते हैं। उदाहरण के लिए, मैमेलिया के अन्तर्गत मांसाहारियों को गण कार्निवोरा में रखा गया है जबकि कीटों के भक्षण पर निर्भर रहने वालों को इन्सैक्टिवोरा गण में स्थान दिया गया है। अधिक समानताओं के आधार पर एक ही गण के जीवों को पुनः फैमिली या कुल में विभाजित किया गया है।
एक ही कुल में सम्मिलित जीव आपस में काफी घनिष्ठता रखते हैं। उदाहरण के लिए, बिल्ली के कुल (फैलिडी) में चीता, तेंदुआ, बिल्ली, शेर आदि सम्मिलित हैं और इन सभी में मूंछें और वापस सिमट जाने वाले नुकीले पंजे होते हैं।
एक ही वंश या जीनस में रखे गए जीवों में और अधिक समानताएं होती हैं। उदाहरण के लिए गण कार्निवोरा के अन्तर्गत वंश कैनिस में कैनिस फैमिलिएरिस (कुत्ता), कैनिस मीजोमीलास (रजतपृष्ठ सियार), कैनिस ल्यूपस (धूसर भेडि़या), कैनिस र्यूफस (लाल भेडि़या) और कैनिस लैटराइन्स (भेडि़या) सम्मिलित हैं। वंश प्रजातियों का ऐसा समूह है जिसमें सम्मिलित जीव प्रजातियों के किसी अन्य समूह से अधिक घनिष्ठ संबंध रखते हैं। अंतिम श्रेणी में एक प्रजाति (स्पीशीज) आती है।

सही एसडी कार्ड चुनें

आजकल सभी डिजिटल उपकरण में मेमोरी कार्ड के लिए जगह होती है जिससे आप उस उपकरण की संग्रहण क्षमता को बढ़ा सकते हैं।
स्मार्टफ़ोन, टैबलेट, म्यूज़िक प्लेयर, डिजिटल कैमरा, लैपटॉप - सभी के लिए आपको एसडी कार्ड का खांचा मिलता है।

लेकिन ध्यान रहे कि सभी उपकरण के लिए एसडी कार्ड अलग-अलग तरह के होते हैं, उनकी गति और संग्रहण क्षमता भी अलग होती है।
इसलिए अपनी ज़रूरत को पहले समझ लीजिये उसके बाद मेमोरी कार्ड खरीदने का सोचें।
प्रोफ़ेशनल फोटोग्राफर को ज़्यादा गति वाला एसडी कार्ड चाहिए जिसमें संग्रहण क्षमता ज़्यादा होता है। शौकिया फोटोग्राफर की ज़रूरत अलग होती है। गति को 2, 4, 8 और 10 के अंकों में माना जाता है।
क्लास 4 से शौकिया फोटोग्राफर का काम चल जाएगा। प्रोफ़ेशनल फ़ोटोग्राफ़र को अत्यंत उच्च गति संग्रहण क्षमता की ज़रूरत होती है और उनके कैमरा क्लास 10 के संग्रहण क्षमता को सपोर्ट करते हैं। इसीलिए अपनी ज़रूरत के हिसाब से अपने एसडी कार्ड को चुनिए।
अत्यंत उच्च गति संग्रहण क्षमता वाले कार्ड प्रोफ़ेशनल इस्तेमाल के लिए होते हैं और इसके लिए जेब ढीली करनी होगी।
ये कार्ड सभी उपकरण पर काम भी नहीं करेंगे। सभी एसडी कार्ड पर उसकी गति के बारे में जानकारी होती है। इसलिए आपको चुनने में कोई दिक़्कत नहीं होगी।
मेमोरी कार्ड माइक्रो, मिनी, मीडियम और स्टैंडर्ड साइज में आते हैं। कोई एक तरह के एसडी कार्ड दूसरे स्लॉट में नहीं जा सकते हैं। इनको आप अपने लैपटॉप से लेकर स्मार्टफ़ोन में इस्तेमाल कर सकते हैं। माइक्रो और मिनी एसडी कार्ड कार्ड के एडॉप्टर भी बाज़ार में मिलते हैं अगर आप उन्हें अपने कैमरे या दूसरी उपकरण में इस्तेमाल करना चाहते हों।
स्टैंडर्ड एसडी कार्ड की संग्रहण क्षमता 1-4 गीगाबाइट की होती है। रोज़मर्रा के इस्तेमाल वाले SDHC कहलाने वाले कार्ड में आपको 2-32 गीगाबाइट संग्रहण क्षमता मिल जायेगी।
हाल में लॉन्च हुए SDXC कार्ड में 32 गीगाबाइट से लेकर 2 टेराबाइट तक की संग्रहण क्षमता मिल जाती है।
Courtesy.....BBC

LED.Light Emitting Diode

प्रकाश उत्सर्जन डायोड (अंग्रेज़ी :लाइट एमिटिंग डायोड) एक
अर्ध चालक-डायोड होता है, जिसमें विद्युत धारा प्रवाहित करने पर यह प्रकाश उत्सर्जित करता है।
यह प्रकाश इसकी बनावट के अनुसार किसी भी रंग का हो सकता है। एल.ई.डी. कई प्रकार की होती हैं। इनमें मिनिएचर, फ्लैशिंग, हाई पावर, अल्फा-न्यूमेरिक, बहुवर्णी और ओ.एल.ई.डी प्रमुख हैं।

मिनिएचर एल.ई.डी. का प्रयोग इंडिकेटर्स में किया जाता है। लैपटॉप, नोटबुक, मोबाइल फोन, डीवीडी प्लेयर, वीडियो गेम और पी.डी.ए. आदि में प्रयोग होने वाली ऑर्गैनिक एल.ई.डी. (ओ.एल.ई.डी.) को एल.सी.डी. और सी.आर.टी. टेक्नोलॉजी से कहीं बेहतर माना जाता है।
यह एक इलेक्ट्रॉनिक चिप है जिसमें से बिजली गुज़रते ही उसके
इलेक्ट्रॉन पहले तो आवेशित हो जाते हैं और उसके बाद ही, अपने आवेश वाली ऊर्जा को प्रकाश के रूप में उत्सर्जित कर देते हैं।
इसका मुख्य प्रकाशोत्पादन घटक गैलियम आर्सेनाइड होता है। यही विद्युत ऊर्जा को प्रकाश में बदलता है।
इनकी क्षमता 50% से भी अधिक होती है। इस तरह वे विद्युत ऊर्जा को प्रकाश ऊर्जा में बदलते हैं। इसकी विशेषता ये है, कि इसे किसी प्लास्टिक फिल्म में भी लगाया जा सकता है। एल.ई.डी. पारंपरिक प्रकाश स्रोतों की तुलना मे बहुत उन्नत है जिसका कारण है, ऊर्जा की कम खपत, लंबा जीवनकाल, उन्नत दृढ़ता, छोटा आकार और तेज स्विचन आदि,
हालांकि, यह अपेक्षाकृत महंगी होती हैं और परंपरागत स्रोतों की तुलना में इनके लिए अधिक सटीक
विद्युत धारा और गर्मी के प्रबंधन की जरूरत होती है। एक विद्युत बल्ब लगभग 1000 घंटे ही प्रकाश दे पाता है, जबकि एल.ई.डी. एक लाख घंटे भी प्रकाश दे सकते हैं।
इतिहास
एल.ई.डी के बारे में पहली रिपोर्ट १९०७ में ब्रिटिश वैज्ञानिक एच जे राउंड की मारकोनी प्रयोगशाला में एक प्रयोग के दौरान संज्ञान में आयी थी। इसका आविष्कार १९२० के दशक में रूस में हुआ था और १९६२ में इसे अमेरिका में एक व्यावहारिक इलेक्ट्रॉनिक घटक के रूप में प्रस्तुत किया गया। जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी में काम करने के दौरान इसका पहला प्रायोगिक प्रत्यक्ष वर्णक्रम १९६२ में निक होलोनिक जूनियर ने बनाया था। निक होलोनिक को एलईडी के पितामह के रूप में जाना जाता है। ओलेग व्लादिमिरोविच लोसेव नामक एक रेडियो तकनीशियन ने पहले पहल पाया कि रेडियो ग्राहकों (रिसीवर) मे प्रयुक्त डायोड से जब विद्युत धारा प्रवाहित होती है तो वे प्रकाश उत्सर्जित करते हैं। १९२७ में उन्होंने एक रूसी जर्नल में एल.ई.डी. का प्रथम विवरण प्रकाशित किया। सभी आरंभिक युक्तियाँ निम्न-तीव्रता के लाल प्रकाश का उत्सर्जन करती थीं। बाद में एम जॉर्ज क्रॉफर्ड ने पीली और लाल-नारंगी एल.ई.डी. की खोज की। इनका प्रयोग घड़ियों, कैल्कुलेटर, टेलीफोन, टी.वी और रेडियो इत्यादि में किया जाता है। आधुनिक एल.ई.डी. उच्च चमक की, दृश्य, अवरक्त और पराबैंगनी तरंगदैर्ध्यों में उपलब्ध हैं। इनके अलावा आजकल श्वेत और नीला एल.ई.डी. भी उपलब्ध है।
इनके लाभ बहुत हैं:-
ऊर्जा की बचत में एल.ई.डी. उपयोगी होता हैं।
इनके छोटे आकार के कारण इन्हें प्रिंटेड सर्किट बोर्ड में लगाना सरल होता है।
अन्य प्रकाश स्रोतो की अपेक्षा एल.ई.डी. बहुत कम विकिरण करते हैं।
एल.ई.डी. का जीवनकाल काफ़ी होता है। एक रिपोर्ट के अनुसार इनका जीवनकाल 35000 से 50000 घंटे तक होता है।
दूसरे फ्लोरोसेंट लैम्प की तरह एल.ई.डी. में मर्करी नहीं होता है। इस कारण इसके विषैले होने की संभावना कम होती है।
उपयोग
एलईडी के विविध उपयोग हैं। प्रायः इनका प्रयोग निम्न-ऊर्जा संकेतकों के रूप में किया जाता है, पर अब इनका प्रयोग सामान्य और ऑटोमोटिव प्रकाश में पारंपरिक प्रकाश स्रोतों की जगह पर किया जा रहा है। इनके छोटे आकार के चलते इन्हें नये पाठ और वीडियो प्रदर्शों और संवेदकों मे प्रयोग किया जा रहा है जबकि इनकी उच्च स्विचन दर संचार प्रौद्योगिकी में उपयोगी है। अभी इनका प्रयोग निम्न स्थानों पर हो रहा है: -
छोटे पैनेलों में उपकरण या यंत्र की दशा (स्टेट) बताने के लिय

विज्ञापन आदि के लिये डिस्प्ले-बोर्ड बनाने में।
अंधेरे में देखने के लिये (जैसे गाड़ियों की लाइट , घरों में बल्ब और टॉर्च के रूप में)
सजावटी प्रकाश के लिए
सड़क पर लाल बत्ती संकेतकों के रूप में भी।

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